सूरजपुर। सावरावा धान खरीदी केंद्र में सामने आए करोड़ों रुपये के घोटाले ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि “सुशासन” और “जीरो टॉलरेंस” जैसे बड़े-बड़े दावों की हकीकत भी उजागर कर दी है। जांच में स्पष्ट अनियमितताएं सामने आने और कलेक्टर द्वारा FIR दर्ज करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद 58 दिन बीत जाने पर भी कार्रवाई का न होना, यह संकेत देता है कि सिस्टम या तो सुस्त है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है।

घोटाले की तस्वीर: आंकड़े जो खुद बोलते हैं*

धान खरीदी सत्र 2025–26 के दौरान हुई जांच में 32,838 क्विंटल धान की कमी सामने आई है।यह कोई सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि एक बड़े स्तर की वित्तीय अनियमितता का प्रमाण है। इतनी बड़ी मात्रा में धान का गायब होना सीधे तौर पर करोड़ों रुपये के घोटाले की ओर इशारा करता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने पुख्ता तथ्यों के बावजूद भी दोषियों के खिलाफ FIR तक दर्ज नहीं हो पाई है।

आदेश बनाम अमल: कागजों का सिस्टम*

कलेक्टर द्वारा स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि जिम्मेदारों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज की जाए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आदेश फाइलों में घूम रहे हैं और कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं दे रही। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि प्रशासनिक आदेशों की गंभीरता अब केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है।

प्रशासनिक निष्क्रियता या सुनियोजित चुप्पी?

पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी अब संदेह पैदा कर रही है। न कोई प्रेस बयान, न कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण, न ही कार्रवाई की कोई समयसीमा ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह केवल लापरवाही है या फिर किसी दबाव में जानबूझकर देरी की जा रही है?

जीरो टॉलरेंस’ का जमीन से गायब होना

सरकार द्वारा बार-बार भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा किया जाता रहा है। लेकिन सावरावा घोटाले का यह मामला इन दावों की जमीनी सच्चाई को उजागर कर रहा है।
जहां कार्रवाई होनी चाहिए थी वहां सन्नाटा है, और जहां जवाबदेही होनी चाहिए वहां चुप्पी। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि “जीरो टॉलरेंस” अब “जीरो एक्शन” में तब्दील होता नजर आ रहा है।

संरक्षण की आशंका: सवालों का दायरा बढ़ा

लगातार 58 दिनों तक कार्रवाई न होना अब केवल देरी नहीं, बल्कि कई तरह की आशंकाओं को जन्म दे रहा है।
जनता और क्षेत्र में यह चर्चा तेज हो चुकी है कि
क्या आरोपियों को किसी राजनीतिक या उच्चस्तरीय संरक्षण का लाभ मिल रहा है?
यदि ऐसा नहीं है, तो फिर कार्रवाई में इतनी ढिलाई क्यों बरती जा रही है—यह सवाल अब हर किसी की जुबान पर है।

जवाबदेही से बचता सिस्टम

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि
जवाबदेही तय करने की कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही।
न तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई हुई, न ही देरी के लिए किसी को जवाबदेह ठहराया गया। यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

जनता के भरोसे पर चोट

सावरावा घोटाले में हो रही देरी ने आम जनता के मन में यह धारणा बना दी है कि बड़े मामलों में भी जिम्मेदारों को आसानी से बचाया जा सकता है। यह न केवल प्रशासन की साख को कमजोर कर रहा है, बल्कि सरकार की छवि पर भी सीधा असर डाल रहा है।

अग्निपरीक्षा में प्रशासन

यह मामला अब प्रशासन और सरकार दोनों के लिए एक अग्निपरीक्षा बन चुका है। यदि अब भी समय रहते दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला प्रशासनिक विफलता और संरक्षण की मिसाल बन जाएगा।

क्या अब टूटेगी खामोशी?

58 दिनों से जारी यह खामोशी अब असहज हो चुकी है।
लोग यह जानना चाहते हैं कि
आखिर कार्रवाई कब होगी?

और क्या “जीरो टॉलरेंस” केवल भाषणों तक ही सीमित रहेगा या जमीनी हकीकत भी बदलेगी?

सावरावा धान घोटाला अब सिर्फ एक आर्थिक गड़बड़ी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि
यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और जवाबदेही की असली परीक्षा बन चुका है।

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी है क्या सिस्टम अपनी चुप्पी तोड़कर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की असलियत उजागर करता रहेगा?



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