सूरजपुर। सरकारी विकास कार्यों की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि उनके उद्घाटन समारोह जितने भव्य होते हैं, उनका भविष्य अक्सर उतना ही उपेक्षित निकलता है। सूरजपुर के शिव पार्क परिसर में जिला विज्ञान उद्यान मद से 41.92 लाख रुपये की लागत से निर्मित विज्ञान पार्क आज इसी सरकारी संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है। जिस परियोजना को जिले में विज्ञान शिक्षा को नई दिशा देने, विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने और बच्चों को प्रयोग आधारित सीखने का अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया था, वही विज्ञान पार्क अब प्रशासनिक उदासीनता, विभागीय लापरवाही और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी के कारण धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता दिखाई दे रहा है।

उद्घाटन में मंच पर मंत्री, सांसद, विधायक और अफसर; आज टूटी संरचनाओं, जंग लगे उपकरणों और प्रशासनिक उदासीनता के बीच दम तोड़ता विज्ञान पार्क
विज्ञान पार्क का उद्घाटन 06 अक्टूबर 2018 को बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक आयोजन के साथ हुआ था। समारोह में तत्कालीन गृह, जेल एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री रामसेवक पैकरा, श्रम खेल एवं युवा कल्याण मंत्री भैयालाल राजवाड़े, सरगुजा सांसद कमलभान सिंह मरावी, प्रेमनगर विधायक खेलसाय सिंह तथा नगर पालिका अध्यक्ष थलेस्वर साहू की गरिमामयी उपस्थिति रही थी। उस समय इसे जिले के छात्रों के लिए आधुनिक विज्ञान शिक्षा का केंद्र बताया गया था और दावा किया गया था कि यहां आने वाले बच्चे वैज्ञानिक सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप से समझ सकेंगे।

यही नहीं, विज्ञान पार्क परिसर में साइंस पार्क के शेड निर्माण एवं चेन लिंक फेंसिंग का कार्य भी जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) मद से कराया गया। यह कार्य वन विभाग, वनमण्डल सूरजपुर द्वारा वर्ष 2017-18 में स्वीकृत 17.70 लाख रुपये की राशि से कराया गया, जिस पर लगभग 17.61 लाख रुपये व्यय हुए। कार्य 1 मई 2018 को प्रारंभ होकर 2 सितंबर 2019 को पूर्ण हुआ। कागजों में सब कुछ समय पर पूरा हो गया, लेकिन जमीन पर आज यह पूरा परिसर उपेक्षा का दस्तावेज बनकर खड़ा है।
विज्ञान सीखने की जगह, अब जंग और जर्जरता का प्रदर्शन*
विज्ञान पार्क का मूल उद्देश्य था कि छात्र यहां लगे वैज्ञानिक उपकरणों, मॉडलों और संरचनाओं के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा, गति, प्रकाश, ध्वनि, यांत्रिकी और अन्य वैज्ञानिक सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप से समझें। यह पार्क एक खुली विज्ञान प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया गया था, जहां से बच्चे ज्ञान प्राप्त कर उसे अपने विद्यालयों और साथियों के बीच साझा कर सकें।

लेकिन वर्तमान स्थिति इस उद्देश्य का उपहास करती है। पार्क में लगे कई वैज्ञानिक मॉडल क्षतिग्रस्त हैं, अनेक उपकरण जंग खा चुके हैं, संरचनाएं टूट-फूट का शिकार हैं और रखरखाव के अभाव में पूरा परिसर अपनी उपयोगिता खो चुका है। जिस पार्क को बच्चों की जिज्ञासा जगानी थी, वह आज सरकारी लापरवाही का मौन प्रदर्शन बन गया है। यह दृश्य केवल एक पार्क की दुर्दशा नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से निर्मित परिसंपत्तियों के संरक्षण को लेकर सरकारी सोच पर गंभीर सवाल है।
उद्घाटन के बाद विज्ञान पार्क को व्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी किसकी थी?*
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब इस परियोजना पर लाखों रुपये खर्च किए गए, तब उसके नियमित रखरखाव, उपकरणों की मरम्मत, शैक्षणिक उपयोग और संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या वन विभाग का दायित्व केवल निर्माण तक सीमित था? क्या जिला प्रशासन ने कभी इसकी वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया? क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि जिस परियोजना का उद्घाटन उन्होंने किया था, वह आज किस हाल में है?
विडंबना यह है कि जिस समय विज्ञान पार्क का उद्घाटन हुआ था, उस समय भी प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और आज भी छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार तथा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुशासन का दावा किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो विकास कार्यों का जीवनचक्र केवल स्वीकृति, निर्माण, उद्घाटन और उसके बाद भूल जाने तक सीमित हो गया हो।

शिलालेख चमक रहे, व्यवस्था धूल खा रही*
विज्ञान पार्क परिसर में लगे शिलालेख आज भी चमक रहे हैं। उन पर जनप्रतिनिधियों के नाम स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन उन्हीं शिलालेखों के सामने जर्जर होती संरचनाएं और निष्क्रिय वैज्ञानिक उपकरण यह सवाल पूछते हैं कि क्या विकास केवल पत्थर पर नाम लिखवाने का माध्यम बनकर रह गया है? जनता के बीच यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि सरकारें परियोजनाएं बनवाने में तो रुचि लेती हैं, लेकिन उन्हें जीवित और उपयोगी बनाए रखने में नहीं।
वन विभाग और जिला प्रशासन की उदासीनता पर भी उठ रहे सवाल*
स्थानीय नागरिकों, अभिभावकों और स्कूली विद्यार्थियों का कहना है कि यदि समय-समय पर पार्क का रखरखाव किया जाता, उपकरणों की मरम्मत होती, वैज्ञानिक गतिविधियां आयोजित की जातीं और स्कूलों को यहां नियमित भ्रमण के लिए प्रेरित किया जाता, तो यह विज्ञान पार्क आज जिले का गौरव बन सकता था। लेकिन वन विभाग और संबंधित प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता ने इसे धीरे-धीरे निष्प्रभावी बना दिया।

नई कलेक्टर से छात्रों की बड़ी उम्मीद*
जिले की नवपदस्थ कलेक्टर रेना जमील से स्थानीय लोगों ने अपेक्षा जताई है कि वे इस विज्ञान पार्क का स्वयं निरीक्षण करें और वन विभाग तथा संबंधित विभागों को तत्काल मरम्मत, वैज्ञानिक उपकरणों की पुनर्स्थापना, परिसर के सौंदर्यीकरण, सुरक्षा व्यवस्था और नियमित संचालन के स्पष्ट निर्देश दें। यदि प्रशासन चाहे तो यह पार्क पुनः विद्यार्थियों के लिए एक जीवंत विज्ञान केंद्र बन सकता है।

सूरजपुर का विज्ञान पार्क केवल एक जर्जर पार्क नहीं है; यह उस सोच का प्रतीक है जिसमें निर्माण को उपलब्धि और संरक्षण को बोझ समझ लिया गया है। लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई सार्वजनिक परिसंपत्तियां यदि कुछ ही वर्षों में अपनी उपयोगिता खो दें, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की गंभीर विफलता है। अब समय आ गया है कि वन विभाग, जिला प्रशासन और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि इस बदहाली पर मौन साधने के बजाय जवाब दें—क्योंकि विज्ञान पार्क का सवाल केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि सूरजपुर की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।
