सूरजपुर। सावारावा धान खरीदी केंद्र में सामने आए करोड़ों के घोटाले ने न सिर्फ व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जिला प्रशासन की कार्यशैली को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। चौंकाने वाली बात यह है कि मामले में स्पष्ट निर्देश जारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

किसानों ने शासन के नियमों का पालन करते हुए ऑनलाइन टोकन के जरिए निर्धारित तिथियों पर अपना धान केंद्र में बेचा, लेकिन अंदरखाने बड़े स्तर पर गड़बड़ी की पटकथा लिखी जा रही थी। आरोप है कि केंद्र प्रबंधक विभु प्रताप सिंह और खरीदी प्रभारी रिजवान खान की मिलीभगत से करोड़ों रुपये के धान की हेराफेरी की गई।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पूरा खरीदी कार्य नोडल अधिकारी और पटवारी की निगरानी में चल रहा था, तो आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी बिना प्रशासन की नजर में आए कैसे हो गई?

रिकॉर्ड और हकीकत में बड़ा फासला

जांच में सामने आया अंतर खुद पूरे मामले की गंभीरता बयान कर रहा है ऑनलाइन रिकॉर्ड में जहां 65,813 क्विंटल से अधिक धान दर्ज था, वहीं मौके पर सिर्फ लगभग 32,975 क्विंटल धान ही मिला। यानी करीब 32,838 क्विंटल धान का सीधा अंतर, जो किसी छोटी चूक नहीं बल्कि सुनियोजित घोटाले की ओर इशारा करता है।

बोरी गिनती में भी गड़बड़ी
केवल धान ही नहीं, वारदाना की संख्या में भी अंतर मिला। यह संकेत देता है कि गड़बड़ी एक स्तर पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में गहराई तक फैली हुई थी।

आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर द्वारा FIR दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। संबंधित बैंक शाखा को भी कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब आदेश जारी हो चुका है, तो 35 दिन बाद भी FIR क्यों नहीं?

क्या प्रशासन अपने ही आदेशों को लागू कराने में असमर्थ है, या फिर कहीं न कहीं जानबूझकर देरी की जा रही है?

एक ही जिले में दो तस्वीरें
जिले के अन्य केंद्रों में अनियमितता सामने आते ही उमेश्वरपुर मे तुरंत FIR दर्ज कर कार्रवाई की गई, लेकिन सावारावा मामले में जारी सुस्ती कई तरह के संदेह पैदा कर रही है।

क्या नियम अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग हैं?

संरक्षण की चर्चा से बढ़ा संदेह
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कहीं इस पूरे मामले में संबंधित लोगों को राजनीतिक या उच्चस्तरीय संरक्षण तो नहीं मिल रहा, जिसके चलते कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।

खामोशी से बढ़ेगा हौसला

यदि इस तरह के गंभीर मामलों में भी कार्रवाई नहीं होती हैं, तो यह साफ संदेश जाएगा कि नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। इससे अन्य केंद्रों में भी गड़बड़ी करने वालों का हौसला बढ़ सकता है।

प्रशासनिक भरोसे पर असर
35 दिन तक कार्रवाई का इंतजार इस बात का संकेत है कि सिस्टम में कहीं न कहीं इच्छाशक्ति की कमी है।

अब जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है—

क्या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा या वाकई दोषियों तक कानून पहुंचेगा?

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