रिंग रोड बार-बार क्यों उखड़ रही? जवाब सिर्फ सड़क का नहीं, पूरी व्यवस्था का चाहिए
सूरजपुर। किसी भी शहर की सड़क केवल डामर और गिट्टी का ढांचा नहीं होती, बल्कि वह सरकार की कार्यशैली, प्रशासनिक समन्वय और विकास की सोच का आईना होती है। सूरजपुर की 16 किलोमीटर लंबी रिंग रोड आज इसी कसौटी पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। करोड़ों लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़क का कुछ ही महीनों में उखड़ जाना केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न है।
लोक निर्माण विभाग सड़क का निर्माण करता है, परिवहन विभाग यह सुनिश्चित करता है कि सड़क की क्षमता से अधिक भार वाले वाहन न चलें और पुलिस-यातायात विभाग नियमों का पालन कराता है। जब तीनों विभागों की भूमिका स्पष्ट है, तब सड़क खराब होने की स्थिति में जिम्मेदारी केवल एक विभाग तक सीमित क्यों रह जाती है।

यदि सड़क निर्माण में गुणवत्ता की कमी रही है तो निर्माण एजेंसी और संबंधित अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि सड़क की क्षमता से अधिक वजन वाले वाहनों ने उसे समय से पहले क्षतिग्रस्त किया है तो परिवहन विभाग और यातायात विभाग की जिम्मेदारी भी उतनी ही तय होनी चाहिए।
लाखों हुए खर्च पर स्थिति जस की तस
40 लाख रुपए से बिटी पेच रिपेयर करा मरम्मत कराई गई उसके बाद भी नहीं बची सड़क, अब 16 करोड़ का सवाल—क्या इस बार बदलेगी सड़क की सूरत
सूरजपुर रिंग रोड की मरम्मत पर पहले लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन सड़क फिर उखड़ गई। अब इसके सुदृढ़ीकरण के लिए करोड़ों रुपये की नई स्वीकृति और टेंडर प्रक्रिया चल रही है। सवाल यह नहीं है कि इस बार कितना पैसा खर्च होगा, बल्कि यह है कि क्या इस बार सड़क के साथ व्यवस्थाए भी सुधरेगी।

यदि वही निर्माण मे पुरानी लापरवाही, वही ओवरलोड वाहन, वही कमजोर निगरानी और वही ढीली जवाबदेही बनी रही तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी परिणाम अलग नहीं होंगे। सड़क फिर टूटेगी, मरम्मत होगी, नया टेंडर निकलेगा और सरकारी धन का बंदरबाट चलता रहेगा। जनता अब केवल नई सड़क नहीं, बल्कि टिकाऊ समाधान चाहती है। विकास तभी सार्थक होगा जब निर्माण के साथ निगरानी और जवाबदेही भी मजबूती से धरातल पर लागू होगी।

ओवरलोड वाहनों पर ढिलाई या कमजोर निर्माण? रिंग रोड ने उठाए कई गंभीर सवाल
रिंग रोड के क्षतिग्रस्त होने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि सड़क आखिर टूट क्यों रही है? यदि निर्माण गुणवत्ता कमजोर थी तो निर्माण एजेंसी जिम्मेदार है। लेकिन यदि सड़क अपनी निर्धारित क्षमता से कई गुना अधिक भार झेल रही है, तो जिम्मेदारी केवल इंजीनियरों तक सीमित नहीं रह जाती सड़क की भार क्षमता इंजीनियर तय करते हैं, लेकिन सड़क की भार क्षमता का पालन करवाने की जिम्मेदारी परिवहन विभाग और यातायात विभाग की होती है। यदि क्षमता से अधिक भार वाले वाहन लगातार गुजरते रहें और उन पर प्रभावी कार्रवाई न हो, तो नई सड़क भी अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती। इसलिए सड़क की मजबूती के साथ-साथ ओवरलोड वाहनों पर सख्त नियंत्रण भी उतना ही आवश्यक है।

तीन विभाग, तीन जिम्मेदारियां… फिर सड़क टूटने पर जवाबदेह कौन।
प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी कार्य की सफलता समन्वय पर निर्भर करती है। सड़क निर्माण, परिवहन विभाग और यातायात विभाग तीन अलग-अलग विभागों के दायित्व हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है—सुरक्षित और टिकाऊ सड़क।
दुर्भाग्य यह है कि जब सड़क अच्छी बनती है तो उसका श्रेय कई विभाग लेते हैं, लेकिन जब वही सड़क कुछ महीनों में उखड़ जाती है तो जवाबदेही तय नहीं हो पाती। ऐसे में जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिम्मेदार कौन है।
सरकार और प्रशासन के लिए यह समय केवल नई सड़क बनाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था स्थापित करने का भी है। यदि हर विभाग अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करे, तभी सार्वजनिक धन का सही उपयोग और जनता का विश्वास दोनों सुरक्षित रहेगी।

रिंग रोड का मुद्दा अब केवल सड़क की मरम्मत तक सीमित नहीं रहा। यह शासन, प्रशासन, तकनीकी गुणवत्ता और जवाबदेही की संयुक्त परीक्षा बन चुका है। जनता को इंजीनियरिंग की तकनीकी से कोई सरोकार नहीं है। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जिस सड़क पर करोड़ों रुपये खर्च हों रहे हैं तो वह वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनी रहे।
यदि निर्माण गुणवत्तापूर्ण होगी, ओवरलोड वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण रहेगा, नियमित निरीक्षण होगा और दोषी अधिकारियों एवं एजेंसियों पर समयबद्ध कार्रवाई होगी, तभी ऐसी परियोजनाओं का उद्देश्य सफल होगा।
