सूरजपुर। सावरावा धान खरीदी केंद्र में सामने आए करोड़ों रुपये के घोटाले ने जिले की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में भारी अनियमितताएं उजागर होने, कलेक्टर द्वारा जिम्मेदारों पर FIR दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश दिए जाने और मामले की गंभीरता सामने आने के बावजूद 77 दिन बीत जाने पर भी दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
अब यह मामला केवल आर्थिक गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता, भ्रष्टाचार को संरक्षण और जवाबदेही से बचते सिस्टम की मिसाल बनता जा रहा है।

जांच में उजागर हुआ बड़ा खेल
धान खरीदी सत्र 2025-26 के दौरान हुई जांच में 32,838 क्विंटल धान की कमी सामने आई थी। इतनी बड़ी मात्रा में धान का गायब होना सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित वित्तीय गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।
करोड़ों रुपये के इस कथित घोटाले में जांच रिपोर्ट आने के बाद उम्मीद थी कि दोषियों पर त्वरित कार्रवाई होगी, लेकिन हुआ उल्टा—फाइलें चलती रहीं और जिम्मेदार बचते रहे।
कलेक्टर के आदेश भी बेअसर

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर ने संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश दिए थे। लेकिन 77 दिन बाद भी आदेश जमीन पर उतरते नजर नहीं आए।
इससे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के निर्देशों का भी पालन नहीं हो रहा, तो फिर व्यवस्था किसके भरोसे चल रही है?
क्या आदेश केवल दिखावे के लिए जारी किए जाते हैं? या फिर नीचे स्तर पर किसी प्रभावशाली संरक्षण के कारण कार्रवाई रोकी जा रही है?
प्रशासनिक निष्क्रियता या सुनियोजित बचाव?
पूरे मामले में जिम्मेदार विभागों और अधिकारियों की चुप्पी अब संदेह को और मजबूत कर रही है।
न कोई आधिकारिक बयान
न कार्रवाई की समयसीमा
न दोषियों की पहचान सार्वजनिक
न FIR की प्रगति
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह केवल सुस्ती है या फिर दोषियों को बचाने का सुनियोजित प्रयास?

‘जीरो टॉलरेंस’ से ‘जीरो एक्शन’ तक
सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती रही है, लेकिन सावरावा घोटाला इन दावों की जमीनी हकीकत सामने ला रहा है।
जहां करोड़ों की गड़बड़ी उजागर हो, वहां कार्रवाई शून्य हो—तो जनता यही कहेगी कि नीति भाषणों तक सीमित है, जमीन पर उसका असर नहीं दिखता।

जनता के भरोसे पर चोट
इस मामले में लगातार देरी से आम लोगों के बीच यह संदेश जा रहा है कि बड़े मामलों में जिम्मेदारों को बचाने की पूरी गुंजाइश रहती है।
जब छोटे मामलों में तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन करोड़ों की गड़बड़ी पर महीनों तक सन्नाटा रहता है, तो जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
अब प्रशासन के सामने अग्निपरीक्षा
सावरावा धान घोटाला अब प्रशासन और सरकार दोनों के लिए अग्निपरीक्षा बन चुका है। यदि अब भी दोषियों पर FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला आने वाले समय में प्रशासनिक विफलता और संरक्षणवाद की मिसाल बन जाएगा।

निष्कर्ष
77 दिन की खामोशी अब सवाल बन चुकी है। लोग जानना चाहते हैं—
आखिर जिम्मेदार कौन हैं?
कार्रवाई कब होगी?
क्या भ्रष्टाचार पर सचमुच जीरो टॉलरेंस है?
या फिर सिस्टम केवल कमजोरों पर सख्त और ताकतवरों पर मौन है?
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या चुप्पी टूटेगी या सावरावा घोटाला भी फाइलों की कब्र में दफन कर दिया जाएगा?
