सूरजपुर। प्रदेश में सुशासन और भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” का दम भरने वाली व्यवस्था के सामने सावरावा धान खरीदी केंद्र का मामला एक आईना बनकर खड़ा हो गया है। करोड़ों रुपये के घोटाले के पुख्ता संकेत मिलने के बावजूद प्रशासन की सुस्त चाल ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

धान खरीदी सत्र 2025–26 में सामने आए इस घोटाले में जांच के दौरान 32,838 क्विंटल धान की कमी दर्ज की गई। कलेक्टर ने मामले को गंभीर मानते हुए FIR दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश भी दिए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महीनों गुजर जाने के बाद भी कागजों से बाहर कार्रवाई नहीं निकल पाई है।
“जीरो टॉलरेंस” या जीरो एक्शन?
सरकार भ्रष्टाचार पर सख्ती के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन सावरावा मामले में प्रशासन की निष्क्रियता इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। आदेश जारी होने के बाद भी जब कार्रवाई आगे नहीं बढ़ती, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या “जीरो टॉलरेंस” सिर्फ भाषणों तक सीमित है?

कागजों में सख्ती, जमीन पर नरमी
फाइलों में सख्त शब्दों में लिखे गए आदेश और वास्तविकता के बीच का फर्क साफ दिखाई दे रहा है। जिम्मेदार अधिकारियों की धीमी कार्यशैली यह संकेत दे रही है कि या तो लापरवाही चरम पर है या फिर जानबूझकर मामला ठंडे बस्ते में रखा जा रहा है।
आदेश के बाद भी खामोशी—शुभ मुहूर्त का इंतजार?
जब जांच पूरी हो चुकी, गड़बड़ी स्पष्ट है और FIR के निर्देश भी जारी हो चुके हैं, तो फिर कार्रवाई में देरी आखिर किस बात की है? क्या प्रशासन किसी “ऊपर से संकेत” या विशेष मुहूर्त का इंतजार कर रहा है, या फिर जिम्मेदारों को बचाने की कोशिश की जा रही है?

राजनीतिक संरक्षण की आहट?
लगातार हो रही देरी ने यह चर्चा भी तेज कर दी है कि कहीं इस पूरे मामले में आरोपियों को राजनीतिक या उच्चस्तरीय संरक्षण तो नहीं मिल रहा। अगर ऐसा नहीं है, तो फिर प्रशासन की यह असामान्य चुप्पी कई शंकाओं को जन्म देती है।
सुशासन की साख पर सवाल
सावरावा घोटाले में कार्रवाई का अभाव न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है, बल्कि सरकार की “सुशासन” वाली छवि पर भी असर डाल रहा है। आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि बड़े मामलों में भी जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है।

अब भी वक्त है—जागे प्रशासन
यह मामला केवल एक घोटाले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता से जुड़ा है। यदि समय रहते दोषियों पर FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो “जीरो टॉलरेंस” का नारा भी भरोसा खो देगा।
नोडल अधिकारी संतोष जायसवाल व बैंक प्रभारी को मिली थी पूरे मामले की जांच कर कार्यवाही करने की जिम्मेदारी लेकिन नोडल अधिकारी और बैंक प्रभारी करोड़ों के घोटाले के मामले में कुंभकर्णी नींद में सोते हुए नजर आ रहे हैं इस मामले में जांच कर हुई कार्रवाई की बात करें तो सिर्फ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है क्या जिम्मेदार अधिकारी जिले के कलेक्टर के आदर्शों का भी पालन करना उचित नहीं समझते क्या उनके आदेशों का अवहेलना करने की उन्होंने मन बना ली है आखिर और कितने दिनों के बाद इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा उचित कार्यवाही जिम्मेदारों के ऊपर की जाएगी यह देखने वाला विषय होगा।

दावे बनाम हकीकत—कितना गहरा अंतर?
सावरावा धान घोटाला अब एक उदाहरण बनता जा रहा है, जहां दावे बड़े हैं लेकिन कार्रवाई नदारद। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस पर सख्ती दिखाता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
