सूरजपुर। जिले के सावरावा धान खरीदी केंद्र में सामने आए करोड़ों रुपये के घोटाले ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में हजारों क्विंटल धान की कमी उजागर होने और कलेक्टर द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद 44 दिन बीत जाने पर भी अब तक FIR दर्ज नहीं हो पाई है। यह स्थिति प्रदेश सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति की जमीनी हकीकत को उजागर करती नजर आ रही है।

धान खरीदी सत्र 2025–26 के दौरान हुए इस मामले में लगभग 32,838 क्विंटल धान की कमी सामने आई है। इतना बड़ा अंतर खुद यह संकेत देता है कि मामला साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित गड़बड़ी का हो सकता है। कलेक्टर द्वारा संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब तक सिर्फ कागजी प्रक्रिया ही नजर आ रही है।
आदेश के बाद भी ठोस कदम नहीं, बढ़ रही शंकाएं
कलेक्टर के निर्देश के बाद खाद विभाग द्वारा पत्र जारी कर नोडल अधिकारी संतोष जायसवाल और बैंक प्रभारी को कार्रवाई की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही।
सवाल उठ रहा है कि जब जांच में गड़बड़ी स्पष्ट है और आदेश भी जारी हो चुका है, तो कार्रवाई में यह देरी आखिर क्यों?
सूत्रों के अनुसार, मामले को दबाने और रफा-दफा करने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन कार्रवाई में लगातार हो रही देरी इन आशंकाओं को बल जरूर दे रही है।

“जीरो टॉलरेंस” पर उठते सवाल
प्रदेश सरकार जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पारदर्शिता की बात करती है, वहीं इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता उस दावे को कमजोर करती दिख रही है। यदि इतने बड़े घोटाले में भी समय पर FIR दर्ज नहीं हो पा रही, तो आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि बड़े मामलों में भी कार्रवाई टाली जा सकती है।
प्रशासनिक लापरवाही या दबाव?
लगातार विलंब से यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं जिम्मेदार अधिकारी किसी दबाव में तो नहीं हैं या फिर जानबूझकर कार्रवाई को टाल रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर इतनी देरी के पीछे कारण क्या है—यह स्पष्ट होना जरूरी है।

सरकार की साख दांव पर
सावरावा धान घोटाला अब सिर्फ एक स्थानीय मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और सरकार की छवि से भी जुड़ गया है। यदि समय रहते दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो इससे जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम पर भी सवाल उठेंगे।
अब भी वक्त है—कार्रवाई से ही बनेगी विश्वसनीयता
यह मामला प्रशासन के लिए एक परीक्षा की घड़ी है। यदि शीघ्र FIR दर्ज कर दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाते हैं, तो “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर विश्वास कायम रह सकता है। अन्यथा यह मामला भी उन उदाहरणों में शामिल हो जाएगा, जहां दावे बड़े थे लेकिन कार्रवाई नदारद रही।

निष्कर्ष
सावरावा धान घोटाला यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती वास्तव में लागू हो रही है या फिर यह सिर्फ कागजों तक सीमित है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—कार्रवाई होगी या फिर सवाल ही सवाल रह जाएंगे।
