सूरजपुर। जिले के सावांरावा धान उपार्जन केंद्र में 32,838 क्विंटल धान की भारी कमी उजागर होने के बाद भी प्रशासनिक चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। औचक निरीक्षण में सामने आई इस बड़ी गड़बड़ी के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज न होना, पूरे तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

रिकॉर्ड कुछ और, जमीन पर कुछ और

1 फरवरी 2026 को हुए निरीक्षण में ऑनलाइन रिकॉर्ड में 65,813.60 क्विंटल धान दर्ज था, जबकि भौतिक सत्यापन में केवल 32,975.60 क्विंटल ही पाया गया। यानी 32,838 क्विंटल धान का सीधा अंतर। इतनी बड़ी मात्रा को “तकनीकी त्रुटि” बताकर नजरअंदाज करना संभव नहीं दिखता।

सूत्रों के मुताबिक जांच के दौरान समिति प्रबंधक विश्व प्रताप सिंह और खरीदी प्रभारी रिजवान खान मौके से अनुपस्थित पाए गए। सूचना के बाद भी उनकी गैरमौजूदगी ने संदेह और गहरा दिया।

बारदाना भी बना पहेली

खाली बारदाना के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर सामने आया। मौके पर 40,750 नग बारदाना मिले, जबकि ऑनलाइन रिकॉर्ड में 32,789 नग दर्ज थे। रजिस्टर और पंजियों का मिलान नहीं हो सका। सवाल उठता है—जब धान और बारदाना दोनों में अंतर है, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?

निर्देश जारी, मगर एफआईआर अब तक नहीं

कलेक्टर कार्यालय की खाद्य शाखा द्वारा संबंधित बैंक शाखा प्रबंधक को प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए जाने की चर्चा है। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी अपराध दर्ज न होना प्रशासन की सुस्ती या फिर किसी “अदृश्य संरक्षण” की ओर इशारा करता है।

दोहरे मापदंड?

हमर उत्थान सेवा समिति ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जब पूर्व में उमेश्वरपुर उपार्जन केंद्र में गड़बड़ी पर तत्काल एफआईआर हुई थी, तो यहां देरी क्यों? क्या नियम और कार्रवाई भी क्षेत्र देखकर तय होती है?
समिति ने बैंक शाखा प्रबंधक, नोडल अधिकारी, उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं और जांच से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो इसे संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार माना जाएगा।

किसानों के भरोसे पर चोट

धान उपार्जन व्यवस्था सीधे किसानों की मेहनत और शासन की साख से जुड़ी है। हजारों क्विंटल धान का गायब होना केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि यह किसानों की उम्मीदों और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा आघात है।

अब सवाल सीधा है—

क्या घोटालेबाजों पर सख्त कार्रवाई होगी, या फिर फाइलों की धूल में सच दब जाएगा?
जिले की जनता और किसान अब प्रशासन की अगली चाल का इंतजार कर रहे हैं।

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