सूरजपुर।
सावरावा धान खरीदी केंद्र में सामने आए करोड़ों रुपये के कथित घोटाले पर तीन महीने बीत जाने के बाद भी ठोस कार्रवाई न होने से अब जनआक्रोश खुलकर सामने आने लगा है। गांव-गांव में चर्चा का विषय बने इस मामले ने अब केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच में 32,838 क्विंटल धान की कमी उजागर होने, भारी आर्थिक अनियमितताओं के संकेत मिलने और कलेक्टर स्तर से FIR दर्ज करने के निर्देश जारी होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी ब कर्मचारियों पर अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होना लोगों को हैरान कर रहा है। आमजन पूछ रहे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये के मामले में प्रशासनिक तंत्र की रफ्तार अचानक इतनी धीमी क्यों पड़ गई?

क्षेत्र में चर्चा है कि यदि कोई सामान्य किसान छोटी सी त्रुटि कर दे तो तत्काल नोटिस, जुर्माना और कार्रवाई हो जाती है, लेकिन जब मामला हजारों क्विंटल धान और करोड़ों रुपये के नुकसान का हो, तब पूरा सिस्टम फाइलों की धूल झाड़ने में व्यस्त नजर आता है।

“क्या बड़े मामलों में नियम बदल जाते हैं?”

सावरावा मामले ने लोगों के मन में यह सवाल गहरा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक सख्ती केवल आम जनता तक सीमित है?

ग्रामीणों और किसानों का कहना है कि यहां नियमों से ज्यादा प्रभाव और पहुंच काम करती दिखाई दे रही है।

लोग पूछ रहे हैं—
कलेक्टर के आदेश के बाद भी FIR दर्ज क्यों नहीं हुई?
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही अब तक तय क्यों नहीं की गई?
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही?
कार्रवाई में देरी का जिम्मेदार कौन है?
क्या दोषियों को बचाने के लिए मामला लंबा खींचा जा रहा है?
इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी अब संदेह को और गहरा कर रही है।

समिति प्रबंधक और खरीदी प्रभारी की मिलीभगत की चर्चा क्षेत्र में जोरों पर है कि समिति प्रबंधक एवं खरीदी प्रभारी की कथित आपसी मिलीभगत से पूरे भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया। धान खरीदी प्रक्रिया में गड़बड़ी, रिकॉर्ड में हेरफेर और स्टॉक में भारी कमी ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन अधिकारियों पर निगरानी और जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी थी, वही अब कार्रवाई के नाम पर चुप्पी साधे बैठे हैं। इससे प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल और तीखे हो गए हैं।

2024-25 खरीदी सत्र में भी हुआ करोड़ों का खेल सूत्र

सीजी रिपब्लिक न्यूज़ द्वारा लगातार इस मामले को प्रमुखता से उठाया जा रहा है। इसी बीच सूत्रों से एक और बड़ा खुलासा सामने आया है। जानकारी के अनुसार खरीदी वर्ष 2024-25 में भी सावरावा धान खरीदी केंद्र में लगभग 15 हजार क्विंटल धान की खरीदी संदिग्ध परिस्थितियों में की गई थी।

आरोप है कि कुछ किसानों का रकबा बढ़ाकर और दूरस्थ ग्राम पंचायतों के किसानों के नाम पर लगातार टोकन जारी किए गए। जहां सामान्य किसानों को टोकन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था, वहीं कथित रूप से चिन्हित किसानों के टोकन बिना बाधा जारी होते रहे।

सूत्रों के अनुसार इस प्रक्रिया के माध्यम से शासन द्वारा मिलने वाले धान बोनस की करोड़ों रुपये की राशि में भी बड़े स्तर पर गड़बड़ी की आशंका है। यदि जिला प्रशासन पिछले खरीदी सत्र की भी निष्पक्ष और बारीकी से जांच कराए, तो भ्रष्टाचार की कई और परतें खुल सकती हैं।

चौपाल से बाजार तक एक ही चर्चा — “कार्रवाई कब?”

सावरावा घोटाला अब पूरे क्षेत्र में जनचर्चा का विषय बन चुका है। चौपालों, बाजारों मे आम लोगों के बीच करोड़ों के भ्रष्टाचार प्रशासनिक कार्यवाही के विलंब की चर्चा हो रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसान की एक बोरी धान में कमी मिले तो तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन यहां हजारों क्विंटल धान गायब होने के बावजूद जिम्मेदारों पर अब तक कोई कानूनी शिकंजा नहीं कसा गया। यही दोहरा रवैया अब जनता के गुस्से की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है।

‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों पर उठे सवाल

प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती रही है, लेकिन सावरावा प्रकरण में तीन महीने से जारी प्रशासनिक सुस्ती ने इन दावों की साख पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनता पूछ रही है—
“यदि दोषी चिन्हित हैं तो गिरफ्तारी क्यों नहीं?”
“यदि आदेश जारी हुए थे तो उनका पालन अब तक क्यों नहीं हुआ?”
“यदि भ्रष्टाचार पर सरकार सख्त है तो कार्रवाई जमीन पर दिखाई क्यों नहीं दे रही?”

फाइलों में उलझता न्याय, बढ़ता अविश्वास

क्षेत्र में यह धारणा तेजी से बन रही है कि मामला अब फाइलों और औपचारिकताओं में उलझाकर धीरे-धीरे ठंडा करने की कोशिश की जा रही है। लोगों का कहना है कि जब तक दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तब तक जनता का विश्वास प्रशासनिक तंत्र से लगातार कमजोर होता जाएगा।

अब यह मामला केवल धान घोटाले का नहीं, बल्कि प्रशासन की विश्वसनीयता और निष्पक्षता की परीक्षा बन चुका है।
लोगों का साफ कहना है—
“अब समय जांच समितियों और कागजी कार्रवाई का नहीं, बल्कि वास्तविक कार्रवाई का है।”

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